हम क्यों बने हुए हैं अमेरिका का हित-साधक?

अमेरिका भारत के साथ अपने रिश्ते को किस रूप में देखता है और भारत से क्या अपेक्षाएं रखता है, इसे दो टूक बयान करने में वहां के युद्ध मंत्री पीट हेगसेट ने कोई लाग-लपेट नहीं बरता। इस वर्ष के सांगरी-ला डायलॉग में दिए उनके भाषण के बाद भारत के लिए यह तय करना आसान हो जाना चाहिए कि अमेरिका से अब क्या उम्मीद रखी जा सकती है? हेगसेट ने 30 मई को सिंगापुर में आयोजित इस डायलॉग को संबोधित किया। उनकी कुछ खास टिप्पणियों पर ध्यान देः

  • दक्षिण एशिया में भारत मोर्चा संभाल सकने वाला शक्तिशाली मुख्य-स्तंभ है। शक्तिशाली भारत “अपने हित में” कार्य करते हुए पूरे इलाके में शक्ति संतुलन बनाए रखने के “हमारे साझा उददेश्यों” को आगे बढ़ा रहा है। (मतलबः अमेरिकी उद्देश्य ही भारत का हित है!)
  • भारत को आदर्श सहभागी (model partner) बताते हुए हेगसेट ने कहा- हम ऐसे मॉडल सहयोगियों के साथ काम करने को प्राथमिकता देंगे, जो सर्व सक्षम हों, जिनकी स्पष्ट समझ हो, जो अपने हितों की रक्षा के लिए तैयार हों, और अग्रिम मोर्चे तक उसे (हितों की रक्षा को) ले जाने को तैयार हों।
  • हेगसेट की ये बातें डॉनल्ड ट्रंप काल में अमेरिका की “सहयोगियों” से अपेक्षा के अनुरूप हैं। इस दौर में “उसूलों पर आधारित संबंध” की बात अमेरिका की जुबान से गायब हो गई है। अब उसे ऐसे “सहयोगी” देशों की जरूरत है, जो अपने खर्च से खुद को तैयार करें और अमेरिका की भू-राजनीतिक जरूरतों के मुताबिक काम करें।  
  • तो हेगसेट ने भारत को पैगाम दियाः रक्षा तैयारियों में जुटे रहो, रक्षा खर्च बढ़ाओ और ऐसा होता रहा, तो अमेरिका अपने सहयोगी देशों की सूची में भारत का दर्जा ऊंचा करता रहेगा। 
  • अमेरिका यही अपेक्षा यूरोपीय देशों, जापान, और दक्षिण कोरिया आदि से भी रख रहा है। इनमें ज्यादातर अमेरिकी मंशा के मुताबिक चलने को तैयार भी हो गए हैं।

बहरहाल, हेगसेट ने जो नहीं कहा, वह भी उल्लेखनीय हैः

  • भारत के संदर्भ में अमेरिकी युद्ध मंत्री ने क्वाड्रैंगुलर सिक्युरिटी डायलॉग (क्वॉड) का जिक्र नहीं किया। क्वॉड पर चीन की कड़ी प्रतिक्रिया होती है। साफ है, ट्रंप की बीजिंग यात्रा के बाद से अमेरिका चीन को चुभने वाली बातें कहने से बच रहा है।
  • भारत- चीन सीमा विवाद का भी उल्लेख उन्होंने नहीं किया, जिसे इस बात का संकेत समझा गया कि इस मामले में अमेरिका किसी का पक्ष लेने से बच रहा है।
  • हेगसेट ने ताइवान का जिक्र तक नहीं किया। साफ है, अमेरिका चीन की “मुख्य चिंता” का ख्याल कर रहा है।

तो इस भाषण का सार क्या समझा जाए? 

संभवतः यही कि अमेरिका फिलहाल खुद चीन से नहीं उलझना चाहता। ट्रंप अपनी बीजिंग यात्रा के दौरान अमेरिका-चीन संबंध के बारे में शी जिनपिंग की तरफ से पेश सूत्र- रचनात्मक रणनीतिक स्थिरता (constructive China-US relationship of strategic stability) पर सहमत हो गए। इसका व्यावहारिक अर्थ है कि दोनों देश टकराव से बचने के साथ-साथ अपने रिश्तों को रचनात्मक रूप देने की कोशिश भी करेंगे। मतलब यह कि वे ऐसी बातें या कार्य करने से बचेंगे, जिसे दूसरा देश अपने खिलाफ समझे। 

मगर चीन के उदय को रोकना अमेरिका की सर्वोपरि चिंता बनी हुई है। यह चिंता तात्कालिक नहीं, बल्कि ढांचागत है। फिलहाल, ट्रंप प्रशासन चीन से रिश्ते में स्थिरता बनाए रखने पर राजी हुआ है, तो उसकी वजह आपूर्ति शृंखला संबंधी उसकी कमजोरियां तथा कृषि एवं अन्य उत्पादों के लिए चीन के बड़े बाजार की उसकी जरूरत है। पिछले साल उसे तजुर्बा हुआ कि चीन से टकराव बढ़ाना उसके लिए अब घाटे का सौदा बन गया है। तो तय किया गया कि जब तक अपनी कमजोरियों को दूर नहीं कर ली जातीं, चीन से स्थिर संबंध बनाए रखना ही बेहतर है। 

लेकिन इस बीच चीन को दबाव मुक्त कर देना अमेरिका अपने माफिक नहीं मानता। उसकी समझ में चीन का उदय रोकने (containment) की जरूरत बनी हुई है। मगर ऐसा कौन करेगा? तो उसकी राय में यह जिम्मेदारी भारत, जापान, फिलीपीन्स, दक्षिण कोरिया आदि जैसे उसके “सहयोगी” देशों को उठानी पड़ेगी। तो हेगसेट नेः

  • भारत में चल रही सैन्य तैयारियों की प्रशंसा की। खास कर उन्होंने हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की “बढ़ती भूमिका” का जिक्र किया।
  • भारत को उन्होंने ऐसे देश के रूप में पेश किया, जो “अपने हिस्से का सुरक्षा बोझ” उठा रहा है। 
  • हेगसेट ने भारी उद्योग और संभारतंत्रीय (logistical) क्षेत्र में “भारत की बढ़ती  क्षमता” का उल्लेख करते हुए कहा कि यह उच्चस्तरीय सैन्य कार्रवाइयों को जारी रखने में मददगार होगी।
  • कुल मिलाकर हेगसेट ने संदेश दिया कि भारत ट्रंप प्रशासन की इस सोच के मुताबिक व्यवहार कर रहा है कि सहयोगियों को अमेरिका को संरक्षक मानने की आदत छोड़ कर रक्षा क्षेत्र में खुद को तैयार करना चाहिए।

भारत सरकार से अपेक्षा होगी कि वह इस बारे में अपना दृष्टिकोण देश और दुनिया के सामने रखे। क्या वह भारत के संसाधनों से अमेरिकी रणनीतिक मकसदों को साधने की भूमिका लेने और उसमें निहित जोखिम को उठाने को तैयार है? 

ट्रंप प्रशासन ने उन देशों के साथ अपने रिश्ते में दिखावे के लिए भी समान स्तर और उनकी संप्रभुता के सम्मान की बात करनी छोड़ दी है, जिन्हें अमेरिका अपना सहयोगी बताता रहा है। इसके बजाय ट्रंप प्रशासन ने लेन-देन (transactional) का रुख अपनाया है, जिसमें नजरिया अधिक से अधिक खून चूस लेने का है। यह मालिक और मातहत का नजरिया है, जैसाकि औपनिवेशिक काल में गुलाम देशों के प्रति रखा जाता था। जिन देशों की सरकारों ने इस नजरिए का विरोध नहीं किया है, अमेरिका उनसे अधिकतम कीमत वसूलने की राह पर आगे बढ़ा है।  

अमेरिका के प्रति भारत और ईरान के रुख की तुलना करते हुए रक्षा विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने दो जून को लिखा- 

“पिछले सप्ताह ट्रंप के वार्ताकारों ने ईरान के साथ एक समझौते को अंतिम रूप दिया, लेकिन राष्ट्रपति ने उसे मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया। इससे उनकी टीम को फिर से वार्ता की मेज़ पर लौटना पड़ा, ताकि उनकी कुछ अधिकतम मांगों को समझौते में शामिल किया जा सके। यह घटना पिछले साल जुलाई में अमेरिका-भारत व्यापार रूपरेखा (फ्रेमवर्क) सहमति की विफलता की याद दिलाती है। 

तब ट्रंप ने शिकायत की थी कि समझौते के फ्रेमवर्क में भारत को आसानी से बहुत छूट दे दी गई है। तब दबाव बढ़ाने के लिए उन्होंने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ़ लगा दिए। छह महीने से अधिक समय तक अमेरिका ये कठोर शुल्क वसूलता रहा। उसके बाद आखिरकार भारत ने समझौते की एक नई रूपरेखा को स्वीकार की, जिसमें भारत की मापी जा सकने वाली जिम्मेदारियां पूर्व निर्धारित हैं और साथ ही निगरानी की व्यवस्था भी शामिल है। जबकि अमेरिका की प्रतिबद्धताएं चरणबद्ध तथा शर्तों पर आधारित हैं, जिन्हें कुछ महत्वपूर्ण स्थितियों में वापस लिया जा सकता है। इस समझौते में भारत ने ऐसे वादे भी किए, जो द्विपक्षीय व्यापार से सीधे संबंधित नहीं हैं। मसलन, रूस से तेल आयात में कटौती। 

उधर ईरान के कठोर रुख अपनाने और वार्ता का कौशल दिखाने का लंबा इतिहास है। यह मानने का कोई विशेष कारण नहीं है कि उसके ठिकानों पर अमेरिकी सैन्य हमले- जो भारत पर दंडात्मक टैरिफ़ के डाले गए दबाव का सैन्य संस्करण हैं- ईरान से ऐसी रियायतें हासिल कर पाएंगे, जिन्हें वह अपने मूलभूत हितों के विरुद्ध मानता हो।”

तो धारणा यह बनी है कि भारत ने अमेरिका से व्यापार वार्ता में ऐसी रियायतें दी हैं, जो भारत के मूलभूत हितों के खिलाफ हैं। यह धारणा भी आज व्यापक रूप से मौजूद है कि रक्षा क्षेत्र में भारत अमेरिकी रणनीति का हिस्सा बन चुका है। इस धारणा का आधार भारत और अमेरिका के बीच हुए चार प्रमुख “फाउंडेशनल” रक्षा समझौते—GSOMIA (2002), LEMOA (2016), COMCASA (2018) और BECA (2020) हैं। 

इस बहस में एक दलील यह है कि ये समझौते भारत की सैन्य क्षमता बढ़ाने के उपकरण हैं। इनसे अमेरिकी और भारतीय सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय संभव हुआ है। उन्नत संचार प्रणालियों, उपग्रह डेटा और भू-स्थानिक (Geo-spatial) जानकारी तक भारत की पहुंच बनी है। चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति के बीच भारत की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत हुई है। 

मगर एक दूसरी समझ यह है कि ये समझौते भारत को धीरे-धीरे अमेरिकी सुरक्षा ढांचे में जोड़ते चले गए हैं। नतीजतन, भारतीय सैन्य प्रणालियां अमेरिकी तकनीक और नेटवर्क पर निर्भर होती जा रही हैं। परिणामस्वरूप भारत के विदेश नीति संबंधी निर्णयों पर परोक्ष दबाव बढ़ा है। हाल के अंतरराष्ट्रीय विवादों में भारत की अमेरिका/ इजराइल के पक्ष में झुकी प्रतिक्रियाओं को इसकी मिसाल बताया गया है। (हेगसेट के भाषण को इस घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में ही समझा जाना चाहिए।) 

यह सब होने के बावजूद ट्रंप प्रशासन ने भारत के प्रति कोई रियायत नहीं बरती है। उसने ऐसे कदम उठाए हैं, जिनसे भारत के चयन संबंधी विकल्प सीमित होते गए हैं। मसलन, 

  • ट्रंप प्रशासन ने ऐसे कदम लगातार उठाए हैं, जिनसे भारत की ऊर्जा सुरक्षा लिए संकट पैदा हुआ है। ईरान पर हमला ऐसा एक परोक्ष कारण है। परोक्ष इसलिए कि उसके पीछे भारत को मुश्किल में डालना मकसद था, इसे साबित नहीं किया जा सकता। लेकिन इससे भारत की ऊर्जा कठिनाइयां बढ़ी हैं और देश की कुल अर्थव्यवस्था दबाव में आई है। बहरहाल, रूस और ईरान से तेल खरीदने पर रोक लगाना तथा अपना एवं वेनेजुएला का महंगा तेल एवं प्राकृतिक गैस खरीदने के लिए भारत को मजबूर करने को ऐसे कदमों में जरूर गिना जाएगा। इनकी वजह से भारतवासियों को अनावश्यक महंगाई और अन्य दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
  • अमेरिका ने भारत पर वहां निर्मित हथियारों को खरीदने के लिए सीधा दबाव बनाया है। इसके अलावा उसने इस क्षेत्र में ऐसी परिस्थितियां पैदा करने की कोशिश की है, जिससे भारत के लिए अपना रक्षा बजट बढ़ाना जरूरी हो जाए। चूंकि भारत ऐसी अमेरिकी मांगों के आगे झुकता चला गया है, इसीलिए पीट हेगसेट ने सिंगापुर में दिए भाषण में भारत की खुल कर तारीफ की।
  • तकनीक, खासकर आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में अमेरिका पर बढ़ती गई भारत की निर्भरता इस क्रम में तीसरा पहलू है। हालांकि यह भारत सरकार का अपना फैसला है, मगर इसे समग्र संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता। इसी के साथ इस बात को भी जोड़ कर देखा जाना चाहिए कि भारत के तकनीक कर्मियों के लिए अमेरिका में कामकाज की स्थितियों को लगातार प्रतिकूल बनाया जा रहा है।
  • ट्रंप प्रशासन ने दुनिया भर की पूंजी को अमेरिका में खींच लाने की नीति के तहत भारत पर भी दबाव बनाया है। दस बिलियन डॉलर के निवेश के वादे के बाद अडानी ग्रुप से भ्रष्टाचार का मामला वापस लेने की घटना को इसी सिलसिले में देखा जाएगा। ह्वाइट हाउस के एक बयान के मुताबिक सिर्फ 2026 में भारतीय पूंजीपतियों ने अमेरिका में 20.5 बिलियन डॉलर के निवेश के सहमति पत्र पर दस्तखत किए हैं। भारत जैसे पूंजी के अभाव वाले देश के हित पर यह कितना बड़ा प्रहार है, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।   

अब यह पूछा जा सकता है कि आखिर भारत सरकार और पूरा शासक वर्ग अमेरिका के ऐसे दबाव में क्यों आ गया है? अगर हम वैश्विक संदर्भ में विचार करें, तो इसका उत्तर हमें मिल सकता है। भू-राजनीति की विशेषज्ञ नेल बोनिला ने इस सिलसिले में लिखा है- “दशकों तक नव-उदारवादी व्यवस्था का हिस्सा बने रहने के दौरान विभिन्न देशों में ऐसे (शासक) तबके उभरे हैं, जिनके भौतिक हित अभिन्न रूप से अमेरिकी बाजार और डॉलर क्लीयरिंग सिस्टम से जुड़ गए हैं।

अतः अमेरिकी साम्राज्य की सैन्य धमकियों के साथ टैरिफ या अन्य प्रकार की वित्तीय अथवा बाजार पहुंच रोकने जैसी धमकियां ऐसे तबकों पर कामयाब हो जाती हैं। टैरिफ से कोई नई चुनौती पैदा नहीं होती, बल्कि पहले मौजूद समस्या संगीन हो जाती है। इन स्थितियों में देसी वित्तीय वर्ग अपने ही राज्य के खिलाफ साम्राज्य का हथियार बन जाता है, जिससे (औपनिवेशिक शिकंजे से मुक्त हुए) उस राज्य का (फिर से) कॉम्प्रेडॉर चरित्र उभर आता है।”  

दरअसल, नेल बोनिला ने re-compradorisation शब्द का इस्तेमाल किया है। मार्क्सवादी सिद्धांत के मुताबिक Comprador शब्द का अर्थ पर-निर्भर बिचौलिया होता है। जब किसी विकासशील या गरीब देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति और वहां के अमीर वर्ग का ढांचा इस तरह बदल जाता है कि वे स्वतंत्र रूप से काम करने के बजाय विदेशी ताकतों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, या वैश्विक महाशक्तियों के एजेंट के रूप में काम करने लगें, तो उस पूरी प्रक्रिया को Compradorization कहते हैं।

विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या भारत में यह स्थिति बन गई है? ट्रंप काल में जब अमेरिका ने यह दो-टूक साफ कर दिया है कि उसके लिए सहयोगी देश का मतलब मातहत और उसका हित-साधक देश है, तो फिर भारत सरकार अपनी विदेश नीति संबंधी प्राथमिकता पर क्यों पुनर्विचार नहीं कर रही है? अपनी जनता के लिए मुश्किलें बढ़ाने की कीमत पर अमेरिका से “दोस्ती” की राह पर वह क्यों चल रही है?

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

Leave a Reply